रायपुर, 21 सितंबर 2026। उम्र बढ़ने के साथ छोटी-छोटी बातें भूल जाना सामान्य हो सकता है, लेकिन यदि भूलने की समस्या लगातार बढ़ रही है और इसका असर व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने लगा है, तो इसे सामान्य उम्र बढ़ने का हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। विश्व अल्ज़ाइमर दिवस के अवसर पर इट्सा हॉस्पिटल्स के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अभिजीत कुमार कोहाट ने अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया के शुरुआती संकेतों को पहचानने और समय पर चिकित्सकीय सलाह लेने के महत्व पर जानकारी साझा की।
हर भूलना डिमेंशिया नहीं
डॉ. कोहाट के अनुसार, उम्र बढ़ने पर कभी-कभी किसी व्यक्ति का नाम याद आने में थोड़ा समय लगना, कोई सामान कहां रखा है यह भूल जाना या किसी घटना के लिए याद दिलाने की जरूरत पड़ना सामान्य हो सकता है।लेकिन जब याददाश्त, सोचने-समझने, तर्क करने, भाषा और अन्य मानसिक क्षमताओं में लगातार गिरावट आने लगे और इसका असर दैनिक जीवन पर पड़ने लगे, तो चिकित्सकीय जांच की जरूरत हो सकती है। डिमेंशिया उम्र बढ़ने की सामान्य प्रक्रिया नहीं है।
अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया में क्या अंतर है?
अक्सर अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया को एक ही बीमारी समझ लिया जाता है, जबकि दोनों अलग-अलग हैं। डिमेंशिया एक व्यापक चिकित्सा शब्द है, जिसका इस्तेमाल याददाश्त और अन्य मानसिक क्षमताओं में ऐसी गिरावट के लिए किया जाता है जो व्यक्ति की रोजमर्रा की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है। वहीं अल्ज़ाइमर रोग डिमेंशिया का एक कारण और इसका सबसे आम कारण है। अल्ज़ाइमर धीरे-धीरे मस्तिष्क की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। बीमारी बढ़ने के साथ व्यक्ति को हाल की बातें याद रखने, सही शब्द खोजने, समस्याएं सुलझाने, परिचित दैनिक कार्य करने, स्थान पहचानने या निर्णय लेने में परेशानी हो सकती है। कुछ मामलों में व्यवहार और व्यक्तित्व में बदलाव भी दिखाई दे सकते हैं।
किन लोगों में बढ़ सकता है जोखिम?
उम्र बढ़ना अल्ज़ाइमर का प्रमुख ज्ञात जोखिम कारक है। इसके अलावा परिवार में बीमारी का इतिहास और कुछ आनुवंशिक कारक भी जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, स्ट्रोक, धूम्रपान, कम शारीरिक गतिविधि, सामाजिक रूप से कम सक्रिय रहना और सुनने की क्षमता में कमी जैसे स्वास्थ्य एवं जीवनशैली से जुड़े कारक भी डिमेंशिया के जोखिम से जुड़े हैं। हालांकि, परिवार में किसी व्यक्ति को अल्ज़ाइमर होने का मतलब यह नहीं है कि अगली पीढ़ी में भी यह बीमारी निश्चित रूप से होगी।
समय पर जांच क्यों जरूरी?
फिलहाल डिमेंशिया का कोई निश्चित इलाज नहीं है, लेकिन समय पर पहचान और सही चिकित्सकीय जांच महत्वपूर्ण है। इससे बीमारी के संभावित कारणों को समझने, इलाज योग्य जोखिम कारकों को नियंत्रित करने, लक्षणों को बेहतर तरीके से संभालने और भविष्य की देखभाल की योजना बनाने में मदद मिल सकती है। कुछ शुरुआती अल्ज़ाइमर रोगियों में नई दवाएं बीमारी से जुड़ी मानसिक क्षमताओं में गिरावट की गति को धीमा कर सकती हैं। हालांकि, ये पूर्ण इलाज नहीं हैं और इनके इस्तेमाल के लिए विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह तथा उचित जांच जरूरी होती है।
स्वस्थ जीवनशैली से जोखिम कम करने में मिल सकती है मदद
डिमेंशिया के जोखिम को कम करने के लिए स्वस्थ जीवनशैली महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके लिए—
- नियमित शारीरिक गतिविधि करें।
- ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रण में रखें।
- तंबाकू से दूर रहें।
- संतुलित आहार लें।
- सामाजिक और मानसिक रूप से सक्रिय रहें।
- सुनने और देखने से जुड़ी समस्याओं का समय पर इलाज कराएं।
परिवार की भूमिका भी अहम
सबसे जरूरी बात यह है कि बार-बार होने वाली भूलने की समस्या को केवल “उम्र का असर” कहकर नजरअंदाज न करें। परिवार के सदस्यों को बुजुर्गों में होने वाले बदलावों को समझना चाहिए और उनके साथ धैर्य एवं सम्मान से व्यवहार करना चाहिए। यदि याददाश्त या व्यवहार में लगातार बदलाव दिखाई दे रहे हों और उनका असर दैनिक जीवन पर पड़ रहा हो, तो समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। समय रहते बदलावों को पहचानना सही कदम उठाने की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

