do-lakdiyan-mutthi-bhar-chhena-insaniyat-ka-aakhri-salaam
Featurelatestछत्तीसगढ़रायपुरलेख

दो लकड़ियाँ, मुट्ठी भर छेना और इंसानियत का आखिरी सलाम

by bholuchand news October 22, 2026
written by bholuchand news

लेखक: डॉ. दीना नाथ यादव, डीन (कला एवं मानविकी संकाय), कोलंबिया प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी , रायपुर 

Dr. Dina nath yadaw

मनुष्य का जीवन केवल जन्म और मृत्यु के बीच की यात्रा नहीं है। यह रिश्तों, जिम्मेदारियों, संवेदनाओं, संघर्षों और मानवीय मूल्यों की कहानी भी है। भारतीय दर्शन हमें सिखाता है कि शरीर नश्वर है, लेकिन मनुष्य के कर्म और उसके द्वारा स्थापित मानवीय मूल्य लंबे समय तक याद किए जाते हैं। हमारी संस्कृति में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की भावना इसी विचार को मजबूत करती है। भारतीय संस्कृति की खूबसूरती यह है कि उसके दर्शन केवल धार्मिक ग्रंथों और उपदेशों तक सीमित नहीं हैं। वे हमारे लोकजीवन, ग्रामीण परंपराओं और रोजमर्रा के व्यवहार में भी दिखाई देते हैं। ऐसी ही एक परंपरा है—गाँव में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार के लिए प्रत्येक घर से दो लकड़ियाँ या मुट्ठी भर छेना (उपले) देना।

सुनने में यह परंपरा बहुत साधारण लग सकती है, लेकिन इसके भीतर सहयोग, संवेदना, सामाजिक एकता और इंसानियत का गहरा संदेश छिपा है।

जब दुश्मनी के बीच भी जाग उठती है इंसानियत

कल्पना कीजिए, एक गाँव में दो व्यक्तियों के बीच जमीन को लेकर वर्षों से विवाद चल रहा है। दोनों परिवारों के बीच बातचीत बंद है। रिश्तों में इतनी कड़वाहट आ चुकी है कि एक-दूसरे के सामने पड़ने पर भी वे नजरें फेर लेते हैं। समय बीतता रहता है, लेकिन मनमुटाव खत्म नहीं होता। फिर एक दिन उनमें से किसी एक व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। मृत्यु का समाचार पूरे गाँव में फैलता है। लोग अपने घरों से निकलकर शोकाकुल परिवार के पास पहुँचने लगते हैं। कोई अर्थी तैयार करने में हाथ बँटाता है, कोई अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी लेकर आता है और कोई मुट्ठी भर छेना लेकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। इसी बीच वह व्यक्ति भी दो लकड़ियाँ लेकर पहुँच जाता है, जिसकी मृतक से वर्षों पुरानी दुश्मनी थी। यह दृश्य मनुष्य के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—जिस व्यक्ति से जीवनभर विवाद रहा, उसकी अंतिम यात्रा में सहयोग करने की प्रेरणा आखिर कहाँ से आती है? क्या यह केवल सामाजिक परंपरा का निर्वाह है, या मनुष्य के भीतर कहीं ऐसी संवेदना भी मौजूद है, जो मृत्यु के सामने अहंकार और वैमनस्य को छोटा कर देती है?

इसका उत्तर शायद मनुष्य की उसी मूलभूत मानवीय चेतना में छिपा है, जो तमाम मतभेदों के बावजूद उसे दूसरे के दुःख में सहभागी बनने की प्रेरणा देती है।

दो लकड़ियाँ नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक

किसी के अंतिम संस्कार के लिए दो लकड़ियाँ देना केवल दाह संस्कार की सामग्री जुटाना नहीं है। यह इस बात का प्रतीक भी है कि समाज अपने किसी सदस्य के दुःख में उसे अकेला नहीं छोड़ता। जीवन में संपत्ति, जमीन, विचार, स्वार्थ और व्यक्तिगत हित लोगों के बीच दीवारें खड़ी कर सकते हैं। कभी छोटी-सी बात वर्षों के विवाद में बदल जाती है। रिश्ते टूटते हैं, बातचीत बंद होती है और मन में कटुता घर कर जाती है। लेकिन मृत्यु एक ऐसी सच्चाई है, जिसके सामने जीवन की क्षणभंगुरता स्पष्ट हो जाती है। ऐसे समय में दो लकड़ियाँ लेकर पहुँचना एक मौन संदेश देता है—हमारे बीच मतभेद रहे होंगे, लेकिन तुम्हारे अंतिम संस्कार के प्रति मेरा सामाजिक और मानवीय दायित्व समाप्त नहीं हुआ है। यह आवश्यक नहीं कि लकड़ी लेकर आने वाला व्यक्ति अपनी पुरानी शिकायतें पूरी तरह भूल गया हो। न ही इससे यह साबित होता है कि जीवनभर का विवाद समाप्त हो गया। लेकिन इतना अवश्य है कि वह अपने मतभेदों से ऊपर उठकर एक मानवीय जिम्मेदारी निभाने का प्रयास कर रहा है। यही इस परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता है।

मुट्ठी भर छेना में छिपा सामूहिक सहयोग का दर्शन

ग्रामीण जीवन में छेना यानी उपले केवल ईंधन का साधन नहीं रहे हैं, बल्कि वे स्थानीय संसाधनों और सामुदायिक जीवन से भी जुड़े हैं। जब गाँव का प्रत्येक घर अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ लकड़ियाँ या मुट्ठी भर छेना देता है, तो अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी केवल एक परिवार पर नहीं रह जाती। पूरा गाँव किसी न किसी रूप में उसका सहभागी बन जाता है। इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण पक्ष समानता भी है। जिसके पास अधिक संसाधन हैं, वह अधिक सहयोग कर सकता है। जिसके पास सीमित साधन हैं, वह अपनी क्षमता के अनुसार छोटा-सा योगदान दे सकता है। यहाँ योगदान की महत्ता उसकी कीमत से नहीं, बल्कि उसके पीछे की भावना से तय होती है। किसी जरूरतमंद परिवार के लिए यह सहयोग केवल सामग्री जुटाने तक सीमित नहीं होता। यह उसे भावनात्मक सहारा भी देता है। उसे महसूस होता है कि दुःख की इस घड़ी में समाज उसके साथ खड़ा है। आज जब आधुनिक जीवन में व्यक्ति और परिवार कई बार सामाजिक रिश्तों से दूर होते जा रहे हैं, तब ऐसी परंपराएँ हमें सामुदायिक सहयोग का महत्व याद दिलाती हैं।

भारतीय दर्शन की असली परीक्षा व्यवहार में होती है

भारतीय दर्शन में करुणा, परोपकार, अहिंसा और कर्तव्यबोध को विशेष स्थान दिया गया है। भगवद्गीता शरीर की नश्वरता और आत्मा की निरंतरता पर विचार करने की प्रेरणा देती है। वहीं, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना मानव समाज को एक व्यापक परिवार के रूप में देखने का संदेश देती है। लेकिन किसी दर्शन की वास्तविक सार्थकता केवल उसे पढ़ने या सुनने में नहीं, बल्कि जीवन में उतारने में है। अपने प्रियजनों की सहायता करना सहज हो सकता है, लेकिन ऐसे व्यक्ति के प्रति भी मानवीय व्यवहार करना, जिससे हमारे मतभेद रहे हों, कहीं अधिक कठिन है। यही वह क्षण है, जब हमारे संस्कारों और मानवीय मूल्यों की असली परीक्षा होती है। गाँव की यह परंपरा हमें बताती है कि मानवता का अर्थ केवल उन लोगों के प्रति संवेदनशील होना नहीं है, जिन्हें हम पसंद करते हैं। इसका अर्थ यह भी है कि हम अपने व्यक्तिगत वैमनस्य के बावजूद किसी की गरिमा, दुःख और जरूरत को समझ सकें। हालाँकि, यह भी सच है कि हर गाँव में यह परंपरा एक जैसी नहीं होती और हर व्यक्ति अपने मतभेदों से ऊपर उठ पाए, यह जरूरी नहीं। फिर भी जहाँ यह परंपरा निभाई जाती है, वहाँ यह सामुदायिक एकजुटता और पारस्परिक सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण बनती है।

क्या मृत्यु हमें जीवन का असली अर्थ समझाती है?

मृत्यु जीवन की सबसे बड़ी सच्चाइयों में से एक है। यह हमें याद दिलाती है कि धन, पद, प्रतिष्ठा, जमीन और संपत्ति सब यहीं रह जाते हैं। अंततः मनुष्य के साथ उसकी पहचान, उसके कर्म और दूसरों के जीवन पर छोड़ा गया प्रभाव ही याद किया जाता है। इसके बावजूद हम जीवन का बड़ा हिस्सा छोटी-छोटी बातों पर विवाद करने, अपने अहंकार को सही साबित करने और दूसरों से दूरी बनाए रखने में बिता देते हैं। कभी-कभी वर्षों तक चला विवाद एक ऐसे रिश्ते को समाप्त कर देता है, जिसे संवाद और समझदारी से बचाया जा सकता था। अंतिम यात्रा में दी गई दो लकड़ियाँ हमें यह सोचने पर विवश करती हैं कि यदि हम मृत्यु के समय मानवीयता को महत्व दे सकते हैं, तो जीवन रहते हुए ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

यदि हम किसी के अंतिम संस्कार में सहयोग कर सकते हैं, तो उसके जीवनकाल में उसके दुःख को समझने, संवाद का रास्ता खोलने और विवाद सुलझाने की कोशिश क्यों नहीं कर सकते?

शायद इस परंपरा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि मानवता का सम्मान केवल अंतिम विदाई के समय नहीं, बल्कि जीवन के हर दिन होना चाहिए।

अंतिम सलाम इंसानियत के नाम

ग्रामीण भारत की ऐसी परंपराएँ हमें याद दिलाती हैं कि समाज केवल लोगों के एक साथ रहने से नहीं बनता। समाज बनता है एक-दूसरे के दुःख में सहभागी बनने, जरूरत के समय सहयोग करने और मतभेदों के बावजूद मानवीय गरिमा बनाए रखने से। दो लकड़ियाँ और मुट्ठी भर छेना देखने में छोटी चीजें हैं, लेकिन इनके पीछे छिपी भावना बहुत बड़ी है। ये बताते हैं कि सहयोग के लिए धनवान होना जरूरी नहीं, संवेदनशील होना जरूरी है। किसी का दुःख बाँटने के लिए बड़े शब्दों की आवश्यकता नहीं, कई बार एक छोटा-सा योगदान भी बहुत कुछ कह जाता है। अंततः सवाल यह नहीं है कि किसी की अंतिम यात्रा में कौन कितनी लकड़ी लेकर आया। असली सवाल यह है कि उस छोटी-सी लकड़ी के साथ वह अपने भीतर से कितना अहंकार, कितनी कटुता और कितनी दूरी छोड़कर आया। क्योंकि जीवन की अंतिम यात्रा में दो लकड़ियाँ केवल चिता के लिए ईंधन नहीं जुटातीं, वे हमें अपने भीतर झाँकने का अवसर भी देती हैं। मुट्ठी भर छेना केवल अग्नि प्रज्वलित करने का साधन नहीं, बल्कि उस सामूहिक संवेदना का प्रतीक है, जो किसी परिवार के दुःख को पूरे गाँव का दुःख बना देती है।

इंसानियत का असली अर्थ शायद यही है—मतभेद हों, लेकिन संवेदना न मरे; रिश्तों में दूरी हो, लेकिन कर्तव्य समाप्त न हो; और जीवन की अंतिम विदाई तक मनुष्य, मनुष्य बना रहे।

यही दो लकड़ियों और मुट्ठी भर छेना का संदेश है। यही भारतीय लोकजीवन की संवेदना है और यही इंसानियत का आखिरी सलाम है।

 

October 22, 2026 0 comments
0 FacebookTwitterPinterestTumblrVKWhatsappEmail
Newer Posts
Older Posts
  • do-lakdiyan-mutthi-bhar-chhena-insaniyat-ka-aakhri-salaam
    दो लकड़ियाँ, मुट्ठी भर छेना और इंसानियत का आखिरी सलाम
  • president-droupadi-murmu-raipur-yuva-prabodhan-nuakhai-2026
    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का युवाओं को संदेश: बड़े सपने देखें और सफलता को राष्ट्र सेवा से जोड़ें
  • chhattisgarh-hockey-league-raipur-2026.jpg
    छत्तीसगढ़ हॉकी लीग का भव्य आगाज, युवा खिलाड़ियों को मिलेगा दिग्गजों से सीखने का मौका
  • urban-challenge-fund-chhattisgarh-vishnu-deo-sai.jpg
    अर्बन चैलेंज फंड से छत्तीसगढ़ के शहरों के विकास को मिलेगी नई गति: मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय
  • rowghat-train-service-bastar-rail-connectivity-2026.jpg
    79 साल का इंतजार खत्म: रावघाट पहुंची ट्रेन, बस्तर में रेल कनेक्टिविटी के नए युग की शुरुआत

फॉलो करें

Facebook Twitter Instagram Linkedin Youtube Whatsapp

फ़िल्मी जगत

  • हनुमान अंश’ की बॉक्स ऑफिस पर धूम, 2 करोड़ की फिल्म ने पार किया ₹60 करोड़ का आंकड़ा; सीक्वल की भी तैयारी

  • Dhurandhar Collection: ‘धुरंधर’ का बॉक्स ऑफिस पर राज, ₹831 करोड़ के साथ बनी सबसे बड़ी हिंदी फिल्म

  • Dharmendra passes away: दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र का 89 वर्ष की उम्र में निधन, बेटे सनी देओल ने दी मुखाग्नि

  • धर्मेंद्र की तबीयत बिगड़ी, वेंटिलेटर पर चल रहा इलाज, डॉक्टरों की टीम निगरानी में

  • कैटरीना कैफ और विक्की कौशल के घर आया नन्हा राजकुमार, फैंस ने दी बधाइयां

Categories

  • Feature
  • latest
  • Uncategorized
  • कृषि
  • कैरियर
  • खेल
  • छत्तीसगढ़
  • जॉब
  • ज्योतिष
  • तकनीक
  • दुनिया
  • देश
  • धर्म
  • फिल्मी जगत
  • बिजनेस
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रायपुर
  • लाइफ़स्टाइल
  • लेख
  • शिक्षा
  • स्वास्थ्य

About Us

Bholuchand.com आपका अपना डिजिटल न्यूज़ पोर्टल है। यहाँ आपको मिलती है हर वो खबर जो आपके लिए ज़रूरी है – चाहे वह स्थानीय मुद्दे हों, देश-दुनिया की ताज़ा हलचल हो या फिर शिक्षा, स्वास्थ्य और करियर से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी। हमारी कोशिश है कि हम आपको सटीक, निष्पक्ष और आसान भाषा में खबरें दें ताकि आप हर घटना को अच्छी तरह समझ सकें।

Facebook Twitter Youtube Linkedin Instagram Whatsapp

दो लकड़ियाँ, मुट्ठी भर छेना और इंसानियत का आखिरी सलाम

October 22, 2026

Recent Articles

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का युवाओं को संदेश: बड़े सपने देखें और सफलता को राष्ट्र सेवा से जोड़ें
October 22, 2026
छत्तीसगढ़ हॉकी लीग का भव्य आगाज, युवा खिलाड़ियों को मिलेगा दिग्गजों से सीखने का मौका
October 21, 2026
अर्बन चैलेंज फंड से छत्तीसगढ़ के शहरों के विकास को मिलेगी नई गति: मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय
October 21, 2026

Featured

दो लकड़ियाँ, मुट्ठी भर छेना और इंसानियत का आखिरी सलाम
October 22, 2026
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का युवाओं को संदेश: बड़े सपने देखें और सफलता को राष्ट्र सेवा से जोड़ें
October 22, 2026
छत्तीसगढ़ हॉकी लीग का भव्य आगाज, युवा खिलाड़ियों को मिलेगा दिग्गजों से सीखने का मौका
October 21, 2026

© 2025 Bholuchand.com | All rights reserved | A platform bringing you news from local roots to global headlines.

  • Home
  • About
  • Disclaimer
  • Privacy Policy
  • Contact
  • Terms & Conditions
Grand Launch of Bholu Chand

Bholuchand News | Latest News | Breaking News
  • होम
  • छत्तीसगढ़
  • देश
  • जॉब
  • कैरियर
  • खेल
  • धर्म
  • फिल्मी जगत
  • बिजनेस

WhatsApp us