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बीमा क्लेम

जिंदा ग्रामीणों को कागजों में मृत दिखाकर किसने डकारे बीमा के 2-2 लाख? कबीरधाम तक पहुंची जांच, 482 क्लेम पर उठे सवाल

कबीरधाम बीमा मामला: जिंदा ग्रामीणों के नाम पर क्लेम का आरोप, 482 मामलों की जांच 2. Alternative SEO Titles:

by bholuchand news

कबीरधाम। सरकारी योजनाओं का मकसद आम लोगों को आर्थिक सुरक्षा देना होता है, लेकिन जब किसी योजना के नाम पर दस्तावेजों में ही खेल होने की आशंका सामने आए, तो सवाल उठना लाजिमी है। छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले से जुड़ा प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना का एक मामला कुछ ऐसे ही सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि कुछ ग्रामीणों के नाम पर मृत्यु के आधार पर बीमा क्लेम किया गया, जबकि उनमें से दो ग्रामीण गांव में जीवित मिले। तीसरे ग्रामीण के परिजनों का कहना है कि वह रोजगार के सिलसिले में रायपुर गया हुआ है।

मामले के तार मध्यप्रदेश में चल रही कथित बीमा क्लेम अनियमितताओं की जांच से जुड़े बताए जा रहे हैं। जांच के दौरान कबीरधाम जिले के तीन ग्रामीणों के नाम सामने आने की जानकारी मिली है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर संबंधित व्यक्ति जीवित हैं, तो उनके नाम पर मृत्यु से जुड़े दस्तावेजों का इस्तेमाल कैसे हुआ? क्या दस्तावेजों के सत्यापन में चूक हुई या किसी ने कथित तौर पर इस स्थिति का फायदा उठाया? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे।

गांव में मौजूद मिले दो ग्रामीण, फिर किसने किया बीमा क्लेम?

मामला पंडरिया विकासखंड के ग्राम पंचायत भेलकी के आश्रित गांव बदनाचुआ का है। यह इलाका मध्यप्रदेश की सीमा से लगा हुआ है। यहां बाबूलाल मरावी और गंगाराम मरावी अपने परिवार के साथ गांव में मौजूद मिले। वहीं रामकुमार के परिजनों ने बताया कि वह रोजी-रोटी की तलाश में रायपुर गया हुआ है।

ग्रामीणों के मुताबिक, उन्हें अपने नाम पर बीमा पॉलिसी होने या मृत्यु के आधार पर क्लेम किए जाने की जानकारी नहीं थी। कथित तौर पर प्रत्येक व्यक्ति के नाम पर दो लाख रुपये के बीमा क्लेम का मामला सामने आने के बाद अब दस्तावेजों की पड़ताल जरूरी हो गई है।

यहां सवाल सिर्फ बीमा की रकम का नहीं, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया का है जिसके आधार पर क्लेम किया गया। यदि दस्तावेजों में किसी जीवित व्यक्ति को मृत दर्शाया गया है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? फिलहाल इसका जवाब उपलब्ध जानकारी से तय नहीं किया जा सकता।

थाने बुलाए जाने के बाद ग्रामीणों को पता चली कथित गड़बड़ी

ग्रामीणों का कहना है कि कुछ दिन पहले उन्हें पूछताछ के लिए कुकदूर थाने बुलाया गया था। इसी दौरान उन्हें पता चला कि उनके नाम कथित बीमा फर्जीवाड़े की जांच में सामने आए हैं।

उनका दावा है कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि उनके नाम पर बीमा क्लेम से जुड़ी कोई प्रक्रिया पूरी की गई है। ऐसे में यह पता लगाना जरूरी होगा कि संबंधित पॉलिसी किसने ली, आवेदन में कौन से दस्तावेज लगाए गए और क्लेम के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र कहां से प्राप्त किए गए।

अगर ग्रामीणों के दावे सही साबित होते हैं, तो यह मामला दस्तावेजों की विश्वसनीयता और बीमा भुगतान की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है। हालांकि, अभी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और जांच के अंतिम नतीजे सामने आना बाकी है।

मध्यप्रदेश में 482 क्लेम जांच के दायरे में, रकम करीब 9.60 करोड़

मिली जानकारी के अनुसार, मध्यप्रदेश में प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना से जुड़े 482 कथित फर्जी क्लेम की जांच की जा रही है। इन मामलों में लगभग 9 करोड़ 60 लाख रुपये की राशि का उल्लेख किया गया है।

इसी जांच के सिलसिले में छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के तीन ग्रामीणों के नाम सामने आने की जानकारी है। इससे मामले की जांच में दूसरे राज्यों से जुड़े व्यक्तियों, दस्तावेजों और बैंक खातों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है।

पुलिस दस्तावेजों के मुताबिक, भोपाल के अजाक थाने में अपराध क्रमांक 01/26 के तहत मामला दर्ज है। इसमें कूटरचित दस्तावेज तैयार करने, उनका इस्तेमाल करने और कथित बीमा धोखाधड़ी से जुड़े आरोपों की जांच की जा रही है।

हालांकि, 482 मामलों में कथित अनियमितताओं का उल्लेख होने का अर्थ यह नहीं है कि सभी आरोप साबित हो चुके हैं। प्रत्येक मामले में दस्तावेजों और संबंधित लेनदेन की जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।

59 बैंक खातों के दस्तावेज खंगाले जा रहे, रकम कहां गई?

इस मामले में बैंक खातों से जुड़े दस्तावेज भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उपलब्ध पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, ICICI बैंक की इंदौर स्थित पिपल्याहाना शाखा से 59 खातों के अकाउंट ओपनिंग फॉर्म, KYC दस्तावेज और बैंक स्टेटमेंट से संबंधित जानकारी जुटाई गई है।

इसके अलावा पंजाब नेशनल बैंक की बेंगलुरु स्थित रामानगरम शाखा के रिकॉर्ड का भी उल्लेख जांच दस्तावेजों में किया गया है। पुलिस रिकॉर्ड में तीन संदिग्धों से जुड़े बैंक खातों के फॉर्म, KYC दस्तावेज और स्टेटमेंट प्राप्त होने की जानकारी भी दी गई है।

छत्तीसगढ़ के तीन पॉलिसीधारकों और खाताधारकों से संबंधित जानकारी मिलने की बात भी सामने आई है। अब जांच में यह स्पष्ट करना होगा कि खाते किसके नाम पर खोले गए, उनका संचालन कौन कर रहा था और कथित बीमा क्लेम की राशि किन खातों में पहुंची।

सवाल यह भी है कि यदि किसी व्यक्ति के नाम का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल हुआ, तो बैंक रिकॉर्ड और बीमा दस्तावेजों के मिलान से इसका पता कैसे लगाया जाएगा? इन पहलुओं पर अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकलेगा।

मृत्यु प्रमाण पत्र किसने बनाया? सत्यापन प्रक्रिया पर सवाल

इस पूरे मामले में सबसे अहम कड़ी मृत्यु प्रमाण पत्र हैं। यदि कोई व्यक्ति जीवित है, तो उसके नाम पर मृत्यु संबंधी दस्तावेज का इस्तेमाल कैसे हुआ, इसकी जांच आवश्यक है।

जांच एजेंसियों को यह पता लगाना होगा कि संबंधित प्रमाण पत्र वास्तव में जारी किए गए थे या उनमें कथित रूप से हेरफेर हुआ। साथ ही यह भी जांचना होगा कि बीमा क्लेम के साथ कौन से रिकॉर्ड जमा किए गए और भुगतान से पहले उनका सत्यापन किस स्तर पर हुआ।

बैंक खातों की KYC प्रक्रिया, पॉलिसी के आवेदन और बीमा राशि के भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड का मिलान भी इस मामले में अहम हो सकता है। लेकिन उपलब्ध जानकारी के आधार पर अभी यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी विशेष अधिकारी, बैंक या बीमा कंपनी की गलती साबित हो चुकी है।

योजना सुरक्षा के लिए है, लेकिन कथित गड़बड़ी ने बढ़ाई चिंता

प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना का उद्देश्य पात्र बीमित व्यक्ति की मृत्यु की स्थिति में निर्धारित शर्तों के तहत नामांकित व्यक्ति को आर्थिक सुरक्षा देना है। ऐसे में यदि जीवित लोगों के नाम पर मृत्यु आधारित क्लेम किए जाने का आरोप सामने आता है, तो यह जांचना जरूरी हो जाता है कि व्यवस्था में कहां चूक हुई।

कबीरधाम के इस मामले में कई सवालों का जवाब मिलना बाकी है। बीमा पॉलिसी किसने ली? मृत्यु संबंधी दस्तावेज किसने उपलब्ध कराए? क्लेम किसने जमा किया? भुगतान किसके खाते में पहुंचा? और क्या संबंधित ग्रामीणों के दस्तावेजों का कथित तौर पर दुरुपयोग किया गया?

इन सवालों के जवाब मिलने पर ही स्पष्ट होगा कि मामला दस्तावेजों के कथित दुरुपयोग का है, सत्यापन में चूक का है या इसके पीछे कोई दूसरी वजह है।

जांच के बाद ही सामने आएगा पूरा सच

बदनाचुआ गांव के तीन ग्रामीणों के नाम सामने आने के बाद मामला स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। दो ग्रामीणों के जीवित मिलने की जानकारी ने कथित क्लेम की प्रक्रिया को लेकर सवाल जरूर खड़े किए हैं, लेकिन केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।

फिलहाल पुलिस दस्तावेजों, बैंक खातों और बीमा रिकॉर्ड से जुड़े तथ्यों की पुष्टि महत्वपूर्ण है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित रूप से कितनी राशि का भुगतान हुआ, उसका वास्तविक लाभ किसे मिला और यदि कोई गड़बड़ी हुई है तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है।

सबसे बड़ा सवाल अब भी यही है—अगर ग्रामीणों के नाम पर मृत्यु आधारित क्लेम किया गया, तो दस्तावेजों की जांच किसने की और रकम आखिर किसके खाते में पहुंची?

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