शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में बैद्यनाथ धाम को नौवां स्थान प्राप्त है, लेकिन इसे लेकर महाराष्ट्र और झारखंड के बीच मतभेद बना हुआ है। महाराष्ट्र के परली और झारखंड के देवघर – दोनों जगहों पर वैद्यनाथ मंदिर हैं, लेकिन धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, देवघर का वैद्यनाथ मंदिर ही वास्तविक ज्योतिर्लिंग माना जाता है।
रावण की भक्ति से जुड़ा है इतिहास
यह कहानी त्रेता युग की है, जब लंका का राजा रावण भगवान शिव का परम भक्त था। उसने हिमालय में कठोर तपस्या की और शिवलिंग की स्थापना कर शिव को प्रसन्न किया। वरदान मांगते समय रावण ने शिव से कहा कि वह इस शिवलिंग को लंका में स्थापित करना चाहता है।
शिव ने शर्त रखी – “रास्ते में यदि तुम इसे कहीं भी ज़मीन पर रखोगे, तो यह वहीं स्थापित हो जाएगा और फिर दोबारा नहीं उठाया जा सकेगा।”
रावण ने शर्त स्वीकार की, लेकिन देवताओं की योजना से उसे रास्ते में विश्राम करना पड़ा और उसने कुछ देर के लिए शिवलिंग एक स्थान पर रख दिया। जब वह दोबारा शिवलिंग उठाने लगा, तो वह हिला तक नहीं। रावण निराश होकर लौट गया और वही शिवलिंग बाद में ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुआ, जो आज बैद्यनाथ धाम के नाम से पूजित है।

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग
शक्ति पीठ के रूप में भी पावन है यह स्थान
बैद्यनाथ धाम की विशेषता यह भी है कि यहां देवी सती का हृदय गिरा था, जिस कारण इसे जयदुर्गा शक्ति पीठ के रूप में भी पूजा जाता है। यहां एक साथ भगवान शिव और देवी पार्वती के दर्शन होते हैं, जो इसे अत्यंत पावन और अद्वितीय बनाता है।
सावन में उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब
श्रावण मास के दौरान कावड़ यात्रा के रूप में लाखों श्रद्धालु यहां जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। वे बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर करीब 100 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हुए देवघर पहुंचते हैं। यह यात्रा आस्था, समर्पण और भक्ति का अद्भुत उदाहरण है।

