गुजरात के पवित्र तीर्थ द्वारका से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित है भगवान शिव का दसवां ज्योतिर्लिंग – नागेश्वर। यह मंदिर शिव भक्तों के लिए विशेष आस्था का केंद्र है और हर साल हजारों श्रद्धालु द्वारका आने पर नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए भी पहुंचते हैं। मान्यता है कि यहां पूजा-अर्चना करने से भक्तों के कालसर्प दोष, सर्प दोष जैसे अशुभ योगों का असर कम होता है। श्रद्धालु यहां नाग-नागिन की मूर्तियां भी अर्पित करते हैं।
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का पौराणिक महत्व
शिवपुराण के रुद्र संहिता में भगवान शिव को “नागेशं दारुकावने” कहा गया है, जिसका अर्थ है – नागों के ईश्वर। इस ज्योतिर्लिंग की कथा असुर दारुका से जुड़ी है। पुरानी मान्यता के अनुसार, दारुका नाम का एक दैत्य शिवभक्तों को बहुत कष्ट देता था। एक बार जब वह एक भक्त सुप्रिय को मारने की कोशिश कर रहा था, तब भगवान शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने दारुका का वध कर अपने भक्त की रक्षा की।
शिव जी के प्रकट होने के बाद भक्तों और देवताओं ने प्रार्थना की कि वे यहीं वास करें। इस पर शिव ने कहा कि वे इस स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजित रहेंगे, जिसे नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाएगा।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग
नागेश्वर का पांडवों से संबंध
महाभारत काल में वनवास के दौरान पांडव भी इस क्षेत्र में आए थे। कथा के अनुसार, भीम ने देखा कि एक गाय तालाब में दूध दे रही है। जब उन्होंने तालाब की तलहटी में जाकर देखा तो वहां एक शिवलिंग मिला। बाद में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि वह लिंग नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है। इसके बाद पांडवों ने शिवलिंग की पूजा की और वहां मंदिर की स्थापना की।
शिव-पार्वती के नाग रूप की कथा
एक मान्यता यह भी है कि इस स्थान पर शिव और पार्वती नाग रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए इस स्थान को नागेश्वर कहा गया। मंदिर में शिवलिंग के ऊपर नाग की आकृति भी बनी हुई है।
मंदिर की विशेषताएं
मंदिर परिसर में भगवान शिव की लगभग 80 फीट ऊंची प्रतिमा स्थित है, जिसमें वे पद्मासन में विराजमान हैं।
सावन महीने में यहां विशेष पूजा का आयोजन होता है।
यह मंदिर ध्यान, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है।
नागेश्वर कैसे पहुंचें?
निकटतम हवाई अड्डा: पोरबंदर (लगभग 125 किमी दूर)
निकटतम रेलवे स्टेशन: द्वारका (लगभग 20 किमी दूर)
पोरबंदर और द्वारका से नागेश्वर के लिए बसें और टैक्सी आसानी से उपलब्ध हैं।

