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पद्म विभूषण तीजन बाई : पंडवानी की अमर आवाज हुई खामोश

by Bholuchand News July 6, 2026
written by Bholuchand News

रायपुर, 5 जुलाई 2026।
छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने वाली विश्वप्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण सम्मानित तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। लंबी बीमारी के बाद रविवार तड़के उन्होंने रायपुर स्थित एम्स में अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ भारतीय लोककला का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया। वे 70 वर्ष की थीं।

उनके निधन की खबर से पूरे देश के कला, साहित्य और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भारतीय कला और संस्कृति की अपूरणीय क्षति बताते हुए श्रद्धांजलि दी, जबकि राष्ट्रपति और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री सहित अनेक नेताओं एवं कलाकारों ने भी गहरा शोक व्यक्त किया।

पद्म विभूषण और विश्वप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई।

पद्म विभूषण और विश्वप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई।

मिट्टी की खुशबू से जुड़ी रही उनकी पहचान

दुर्ग जिले के गनियारी गांव में वर्ष 1956 में जन्मी तीजन बाई बचपन से ही लोककला और महाभारत की कथाओं की ओर आकर्षित थीं। उनके नाना बृजलाल परधी से उन्होंने पंडवानी की बारीकियां सीखीं। उस समय यह कला लगभग पूरी तरह पुरुष कलाकारों तक सीमित थी, लेकिन तीजन बाई ने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देते हुए इस क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।

13 वर्ष की उम्र से शुरू हुआ संघर्ष

महज 13 वर्ष की आयु में उन्होंने सार्वजनिक मंच पर पंडवानी गाना शुरू किया। महिला होने के कारण उन्हें सामाजिक विरोध, तिरस्कार और बहिष्कार तक झेलना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें परिवार और समाज से अलग होकर झोपड़ी में रहना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी कला नहीं छोड़ी। यही संघर्ष आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

पंडवानी को गांव से विश्व मंच तक पहुंचाया

तीजन बाई ने अपनी दमदार आवाज, अभिनय और अनूठी प्रस्तुति शैली से पंडवानी को नई पहचान दी। उन्होंने कपालिक शैली में प्रस्तुति देकर उस परंपरा को तोड़ा, जिसे लंबे समय तक केवल पुरुष कलाकार निभाते थे। उनकी प्रस्तुतियों में महाभारत के पात्र जीवंत हो उठते थे और दर्शक स्वयं को उस कथा का हिस्सा महसूस करते थे।

उनकी कला केवल भारत तक सीमित नहीं रही। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों में उन्होंने पंडवानी का प्रदर्शन कर छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।

पुरस्कारों से सजा गौरवशाली सफर

लोककला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा।

  • पद्म श्री (1988)
  • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)
  • पद्म भूषण (2003)
  • फुकुओका पुरस्कार (2018)
  • पद्म विभूषण (2019)
  • संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप
  • विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा मानद डी.लिट. उपाधियां

केवल कलाकार नहीं, एक संस्था थीं तीजन बाई

तीजन बाई ने केवल पंडवानी का मंचन नहीं किया, बल्कि नई पीढ़ी को इस लोककला से जोड़ने का भी कार्य किया। उन्होंने अनेक युवा कलाकारों को प्रशिक्षण देकर इस विरासत को आगे बढ़ाया। भारतीय लोककलाओं के संरक्षण में उनका योगदान सदैव याद रखा जाएगा।

आखिरी सफर भी सम्मान के साथ

लंबी बीमारी के बाद 5 जुलाई 2026 की सुबह रायपुर एम्स में उनका निधन हुआ। इसके बाद उनके पैतृक गांव में राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। हजारों लोगों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी।

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान हमेशा रहेंगी तीजन बाई

तीजन बाई ने सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा किसी बंधन की मोहताज नहीं होती। उन्होंने पंडवानी जैसी लोककला को गांव की चौपाल से उठाकर विश्व के प्रतिष्ठित मंचों तक पहुंचाया। उनका जीवन संघर्ष, आत्मविश्वास और संस्कृति के प्रति समर्पण की मिसाल है।

उनकी आवाज अब भले ही खामोश हो गई हो, लेकिन उनकी पंडवानी आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।


प्रमुख उपलब्धियां

  • जन्म : 1956, गनियारी (दुर्ग, छत्तीसगढ़)
  • कला : पंडवानी (कपालिक शैली)
  • सार्वजनिक प्रस्तुति : लगभग 13 वर्ष की आयु से
  • पद्म श्री : 1988
  • पद्म भूषण : 2003
  • पद्म विभूषण : 2019
  • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार : 1995
  • निधन : 5 जुलाई 2026, एम्स रायपुर
  • अंतिम संस्कार : राजकीय सम्मान के साथ

यह भी पढ़ें: भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर रायपुर में आयोजित

अन्य खबरों के लिए
  • भारत सरकार – पद्म पुरस्कार: https://www.padmaawards.gov.in/
  • संगीत नाटक अकादमी: https://sangeetnatak.gov.in/
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